मानसिक स्वच्छता दिवस के रूप में संवत्सरी पर्व की भूमिका

इस दिन सभी परस्पर एक-दूसरे से अपने ज्ञात और अज्ञात भूलों अथवा अपराधों के लिए क्षमा याचना करते हैं, न केवल परस्पर ही, अपितु मानवमात्र और प्राणिमात्र से भी क्षमा की प्रार्थना करते हैं। इसप्रकार प्रत्येक प्राणिमात्र के प्रति क्षमायाचना करते हुए अपने मन की शुद्धि का पर्व मनाया जाता है। अक्सर हम अपने मित्रों से क्षमा मांगते हैं, जबकि क्षमा तो हमें अपने शत्रुओं से मांगनी चाहिए।

Dr S. P. Jain, Acting Director, K.J. Somaiya Centre for Studies in Jainism shares insights on Michhami Dukkdam

मानसिक स्वच्छता दिवस के रूप में संवत्सरी पर्व की भूमिका
डा. शुद्धात्मप्रकाश जैन

पर्यूषण पर्व जैनधर्म के सर्वोत्कृष्ट पर्व के रूप में जाना जाता है। इसी पर्यूषण पर्व के दौरान जैनधर्मावलम्बी संवत्सरी पर्व या क्षमापना पर्व भी मनाते हैं। पर्यूषण शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है- परि और उष्ण। परि अर्थात् सभी ओर से तथा उष्ण अर्थात् कर्मों का दहन करना। इसप्रकार पर्यूषण शब्द कर्मों के नाश करने का प्रतीक है। जैनधर्म के दो सम्प्रदाय हैं& श्वेताम्बर और दिगम्बर। श्वेताम्बर धर्मावलम्बी इस पर्व को 8 दिन तक मनाते हैं और इसके पश्चात् दिगम्बर धर्मावलम्बी इस पर्व को 10 तक मनाते हैं- इसप्रकार यह पर्व कुल 18 दिनों तक चलता है।
प्रायः सामान्यजन को यह प्रश्न होना स्वाभाविक है कि यह पर्व क्यों मनाया जाता है, उत्तर इसप्रकार हो सकता है कि जिस प्रकार हम प्रतिदिन अपने शरीर की शुद्धि करते हैं, उसी प्रकार यह पर्व मन की शुद्धि का पर्व है। न केवल जैनों को ही यह पर्व मनाना चाहिए, अपितु यह तो प्राणिमात्र का पर्व है। यह पर्व किसी धर्म या सम्प्रदाय से सम्बन्धित न होकर सम्पूर्ण मनुष्यजाति के हितार्थ है। यदि हर मनुष्य इसे मनाये तो आज मनोमालिन्य, कलुषता, विद्वेष, कलह आदि समस्याओं का समाधान अनायास ही हो सकता है। इस दृष्टि से इस पर्व को अन्तरराष्ट्रीय पर्व के रूप में स्वीकृति प्रदान की जा सकती है।
ईसामसीह को जब सूली पर चढ़ाया गया, उस समय उन्होंने कहा- “हे प्रभु! ये लोग क्या कर रहे हैं, इसका इनको ज्ञान नहीं है, इसलिए इन्हें मेरी ओर से क्षमा कर देना। ये अज्ञानतावश ऐसा कर रहे हैं, इन्हें क्षमा करना।” इस प्रकार न केवल जैनधर्म में क्षमा की बात कही गई है । अपितु विश्वधर्म का यही कहना है।

यद्यपि क्षमापना पर्व मनाने के लिए किसी निश्चित दिवस का इन्तजार करना उचित नहीं है। क्या मन की स्वच्छता के लिए भी किसी नियत दिन का इन्तजार करना उचित है।  मन में विकारों और कषायों की जब उत्पत्ति हो जाये तभी उनका परिमार्जन कर शुद्धि कर लेनी चाहिए। तथापि गलती करने वाला गलती का अहसास होने पर भी अपने अहंकार के कारण क्षमा मांगने को सहज ही तैयार नहीं हो पाता है, अतः क्षमापनापर्व के प्रसंग पर सहज ही ऐसा वातावरण बन जाता है कि गलती करने वाला अपनी गलती को भूलकर सहज ही क्षमा करने और क्षमा मांगने को तैयार हो जाता है।
इस दिन सभी परस्पर एक-दूसरे से अपने ज्ञात और अज्ञात भूलों अथवा अपराधों के लिए क्षमा याचना करते हैं, न केवल परस्पर ही, अपितु मानवमात्र और प्राणिमात्र से भी क्षमा की प्रार्थना करते हैं। इसप्रकार प्रत्येक प्राणिमात्र के प्रति क्षमायाचना करते हुए अपने मन की शुद्धि का पर्व मनाया जाता है। अक्सर हम अपने मित्रों से क्षमा मांगते हैं, जबकि क्षमा तो हमें अपने शत्रुओं से मांगनी चाहिए।
क्षमा के प्रसंग पर अक्सर कहा जाता है कि सामने वाले ने मुझसे क्षमा मांगी ही नहीं तो मैं क्षमा कैसे करूं, लेकिन यदि ऐसा हो तो इस पर्व के आयोजन में पराधीनता आ जायेगी। कोई जीव हमसे क्षमा मांगे, चाहे नहीं, हमें क्षमा करे, चाहे नहीं, हम तो अपनी ओर से सबको क्षमा करते हैं और सबसे क्षमा मांगते हैं- इसप्रकार हम तो अब किसी के शत्रु नहीं रहे और न हमारी दृष्टि में कोई हमारा शत्रु रहा है। इसीप्रकार क्षमा मांगने पर भी कोई यदि हमें क्षमा नहीं करता है तो क्रोध का त्याग न करने से उसका ही बुरा होगा, हमने तो क्षमायाचना द्वारा मान का त्याग कर, अपने में विनयधर्म प्रकट कर लिया। इसप्रकार इस पर्व को मनाने के लिए कोई पराधीनता नहीं है। क्षमायाचना और क्षमादान- ये दोनों ही हृदय को हल्का करने वाली उदात्त वृत्तियां हैं बैरभाव को मिटाकर परमशान्ति प्रदान करने वाली हैं।

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